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आदिकाल के प्रतिनिधि रचनाकार और रचनाएं

  आदिकाल  के प्रमुख रचनाकार और उनकी रचनाएं  प्रमुख सिद्ध रचनाएं रचनाकार रचना सरहपा—  दोहाकोश शबरपा—  चर्यापद डोंभिपा—  डोंबिगीतिका,योगचर्या आदि अब्दुल रहमान—  संदेश रासक नरपति नाल्ह—  बीसलदेव रासो अपभ्रंश हिंदी चंद्रवरदाई—  पृथ्वीराज रासो (डिंगल पिंगल हिंदी) जगनिक—  परमाल रासो दलपति विजय—  खुमान रासो (राजस्थानी हिंदी) शार्गंधर—  हम्मीर रासो नल्ह सिंह—  विजयपाल रासो जल्ह कवि—  बुद्धि रासो माधवदास चारण—  राम रासो

रासो काव्य परंपरा

     रासो काव्य की पृष्ठभूमि रासो काव्य से हमारा तात्पर्य आदिकालीन साहित्य की वीरगाथात्मक कृतियों से है। आदिकालीन साहित्य में रास ग्रंथ और रासो ग्रंथ दोनों प्रकार की रचनाओं की चर्चा मिलती है। रास साहित्य और रासो साहित्य का मुख्य अंतर भानुभूति को लेकर है। रास साहित्य की संवेदना धार्मिक अनुभूति अथवा लौकिक प्रेम की अनुभूति से जुड़ी हुई है। रास काव्य का प्रसार जैन साहित्य में देखने को मिलता है। आदिकालीन साहित्य में रास काव्य का नाम जैन रचनाकारों द्वारा लिखे गए ग्रंथों और ‘संदेश राक्षक’ जैसे प्रेमानुभूति प्रधान काव्य संवेदना के लिए रूढ़ हो गया है। अब हम रासो साहित्य को समझने का प्रयास करेंगे। रासो शब्द की व्युत्पत्ति रासक, रासा, राउस आदि शब्दों से मानी जाती है। राजस्थानी में रासो का अर्थ होता है युद्ध या कलह। रासो शब्द का व्यवहार छंद में वैविध्य के लिए भी होता है। आचार्य शुक्ल ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति रसायण शब्द से मानी जाती है। वस्तुतः रासो साहित्य की रचना चारणों द्वारा हुई थी। चारणों का साहित्य में आगमन सामंतवादी व्यवस्था के समानांतर होता है। सामंतों के जीवन में दो बातों ...

नाथ साहित्य का परिचय एवं विशेषताएं

                         नाथ साहित्य संपादित करें सिद्धों की वाममार्गी भोगप्रधान योगसाधना की प्रतिक्रिया स्वरुप नाथ पंथी का आरंभ हुआ। नाथ पंथ के साधक  हठयोग  की साधना करते थें।  राहुल सांकृत्यायन  नाथों को सिद्धों की परम्परा का ही विकसित रूप मानते हैं। इस पंथ के प्रवर्तक  मत्स्येन्द्रनाथ  और  गोरखनाथ  माने गए हैं। इनका समय 12वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी के अंत तक माना जाता है। नाथ पंथ के लिए सिद्धमत, सिद्धमार्ग, योगमार्ग, योगसम्प्रदाय, अवधूतमत एवं अवधूत-सम्प्रदाय नाम भी प्रसिद्ध हैं। सिद्ध लोग जहाँ नारी भोग में विश्वास करते थें, वहीं नाथ पंथी उसके विरोधी थें। नाथ सम्प्रदाय ने नारी की एक प्रकार से निंदा की है और उन्हें माया के समतुल्य माना है।  वामाचार  के विरुद्ध इन्होंने पवित्र योगसाधना का विकास किया है। इन्होंने सिद्धों की बहिर्वर्ती साधना के विपरीत अन्तःसाधना पर बल दिया।  पतंजलि  के योगदर्शन का आधार लेकर इन्होंने  हठयोग  दर्शन को विकसित किया। इन्होंने...

सिद्ध साहित्य विशेषता एवं प्रमुख ग्रंथ

                    सिद्ध साहित्य संपादित करें बौद्ध धर्म  के  वज्रयान  शाखा के अनुयायी उस समय सिद्ध कहलाते थें।  बौद्धमत  को मानने वाले आरंभ में ईश्वर की भक्ति का विरोध करते थें, लेकिन धीरे-धीरे वे ही  बुद्ध  को भगवान के रूप में पूजने लगें और जब  बौद्ध धर्म  में तांत्रिक सिद्धों का प्रभाव बहुत बढ़ गया, तो यह धर्म अपने वास्तविक रूप और दिशा से एकदम अलग हो गया। आठवीं शताब्दी के आस-पास इन तांत्रिक सिद्धों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया था। इन्होंने  बौद्ध धर्म  के त्याग और संयम के स्थान पर भोग विलास को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया था। शराब पीना और निम्न वर्ग की स्त्रियों को  योगिनी  कहकर उनके साथ भोग विलास करना आवश्यक समझा जाने लगा था।  मांस ,  मत्स्य ,  मदिरा ,  मैथुन  और  मुद्रा , इन पाँच मकारों का सेवन इनकी साधना का प्रमुख अंग बन गया था। सिद्धों के चमत्कारों का नारी-समाज पर इतना प्रभाव पड़ा कि स्त्रियाँ लोक-लाज, कुल मर्यादा को छोड़कर विपरीत दिशा में...

हिंदी साहित्य के आदिकाल का नामकरण और परिस्थितियों

हिंदी साहित्य के इतिहास  का प्रारम्भिक चरण है, जिसका समय 10वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी (1050 से 1375  विक्रम संवत् ) तक माना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह युग  विकेंद्रीकरण  की ओर जा रहा था।  सम्राट् हर्षवर्धन  की मृत्यु के पश्चात्  भारतवर्ष   में केंद्रीयता की भावना प्रायः लुप्त हो चुकी थी और देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो चुका था। इन छोटे राज्यों के राजा ज़रा-ज़रा सी बात पर आपस में युद्ध करते रहते थें। दूसरी तरफ़ देश पर बाह्य आक्रांताओं के निरंतर आक्रमण हो रहे थें। देश का वातावरण भारी हलचल और अशांति से भरा हुआ था। आदिकाल के नामकरण की समस्या संपादित करें हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन   में आदिकाल सदा से विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा है। चाहे इसके नामकरण की बात हो या काल-विभाजन की, आदिकाल को लेकर इतिहासकारों व विद्वानों के मध्य पर्याप्त मतभेद मिलते हैं क्योंकि आदिकाल के इतिहास का समुचित पर्यालोचन करने में इतिहासकारों व विद्वानों को कठिनाई होती है। इसके पीछे का कारण यह है कि इस समय के कुछ ग्रंथ अप्राप्य हैं तो कुछ रचनाओं पर प्र...