नाथ साहित्य का परिचय एवं विशेषताएं
नाथ साहित्य
सिद्धों की वाममार्गी भोगप्रधान योगसाधना की प्रतिक्रिया स्वरुप नाथ पंथी का आरंभ हुआ। नाथ पंथ के साधक हठयोग की साधना करते थें। राहुल सांकृत्यायन नाथों को सिद्धों की परम्परा का ही विकसित रूप मानते हैं। इस पंथ के प्रवर्तक मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ माने गए हैं। इनका समय 12वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी के अंत तक माना जाता है। नाथ पंथ के लिए सिद्धमत, सिद्धमार्ग, योगमार्ग, योगसम्प्रदाय, अवधूतमत एवं अवधूत-सम्प्रदाय नाम भी प्रसिद्ध हैं। सिद्ध लोग जहाँ नारी भोग में विश्वास करते थें, वहीं नाथ पंथी उसके विरोधी थें। नाथ सम्प्रदाय ने नारी की एक प्रकार से निंदा की है और उन्हें माया के समतुल्य माना है। वामाचार के विरुद्ध इन्होंने पवित्र योगसाधना का विकास किया है। इन्होंने सिद्धों की बहिर्वर्ती साधना के विपरीत अन्तःसाधना पर बल दिया। पतंजलि के योगदर्शन का आधार लेकर इन्होंने हठयोग दर्शन को विकसित किया। इन्होंने षटचक्रभेदन, कुंडलिनी जागरण तथा नादबिन्दु की साधना को महत्त्वपूर्ण माना। हठयोग की जटिलता तथा साधना पद्धति की कठिनाइयों के कारण इनकी साधना में गुरु का काफ़ी महत्व दिखाई देता है। नाथ पंथ जीवन के प्रति सहज और संतुलित दृष्टि को अपनाने के पक्षधर रहे हैं। सामाजिक एवं आध्यात्मिक अतिचारों-अतिवादों का इन्होंने विरोध किया है। पश्चिम भारत में प्रचार-प्रसार के कारण नाथ पंथियों की भाषा ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी एवं हरियाणवी से प्रभावित है। नाथ साहित्य के आरंभकर्ता गोरखनाथ माने जाते हैं। वे मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थें। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार गोरखनाथ का समय 845 ई॰ माना जाता है। डॉ॰ हजारीप्रसाद द्विवेदी उन्हें 9वीं सदी का कवि मानते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल उन्हें 13वीं सदी तथा डॉ॰ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल उन्हें 11वीं सदी से संबंधित मानते हैं। गोरखनाथ की कुछ रचनाएँ इस प्रकार हैं-सबदी, पद, प्राण-संकली, सिध्यादरसन, नरवै-बोध, अभैमात्राजोग, आत्मबोध पन्द्रह तिथि, सप्तवार, मछिन्द्र गोरख बोध, रोमावली, ग्यानतिलक, ग्यानचौतीसा एवं पंचपात्रा। डॉ॰ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखबानी नाम से उनकी रचनाओं का एक संकलन भी संपादित किया है। नाथ साहित्य के विकास में जिन अन्य कवियों ने योगदान दिया, उनमें चौरंगीनाथ, गोपीचंद, चुणकरनाथ, भरथरी, जालंधरापम आदि प्रमुख हैं। नाथों की कुल संख्या 9 मानी गई है।[24][23][5][41][43][7]
- नाथ साहित्य की विशेषता
- नाथों साहित्य के जरिये सामंती भोगमूलक समाज में योग तथा संयम का प्रसार हुआ।
- इन्होंने हिंदू-मुस्लिम दोनों की सहभागिता पर बल दिया।
- नाथ हठयोग में विश्वास करने वाले और हठयोगी साधना द्वारा शरीर एवं मन को शुद्ध कर शून्य में समाधि लेने वाले थें।
- इन्होंने ज्ञान निष्ठा को पर्याप्त महत्व प्रदान किया गया है।
- इन्होंने मनोविकारों और भोग विलास की भरसक निंदा की है।
- नाथ पंथी कवियों ने नारी को माया मानकर उनसे दूर रहने को कहा है।
- इस साहित्य में गुरु को विशेष महत्व प्रदान किया गया है।
- इस साहित्य से हठयोग का उपदेश प्राप्त होता है।
- इनका रूखापन और गृहस्थ के प्रति अनादर का भाव इस साहित्य की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है।
- इन्होंने मन, प्राण, शुक्र, वाक्, और कुंडलिनी इन पांचों को संयम में रखने के तरीकों को हठयोग कहा है।
- इस साहित्य में भगवान शिव की उपासना विशेष रूप से मिलती है।
- नाथ साहित्य में साधनात्मक शब्दावली का प्रयोग भी बहुलता में मिलता है।
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