हिंदी साहित्य के आदिकाल का नामकरण और परिस्थितियों

हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रारम्भिक चरण है, जिसका समय 10वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी (1050 से 1375 विक्रम संवत्) तक माना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह युग विकेंद्रीकरण की ओर जा रहा था। सम्राट् हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् भारतवर्ष में केंद्रीयता की भावना प्रायः लुप्त हो चुकी थी और देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो चुका था। इन छोटे राज्यों के राजा ज़रा-ज़रा सी बात पर आपस में युद्ध करते रहते थें। दूसरी तरफ़ देश पर बाह्य आक्रांताओं के निरंतर आक्रमण हो रहे थें। देश का वातावरण भारी हलचल और अशांति से भरा हुआ था।




आदिकाल के नामकरण की समस्या

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हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में आदिकाल सदा से विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा है। चाहे इसके नामकरण की बात हो या काल-विभाजन की, आदिकाल को लेकर इतिहासकारों व विद्वानों के मध्य पर्याप्त मतभेद मिलते हैं क्योंकि आदिकाल के इतिहास का समुचित पर्यालोचन करने में इतिहासकारों व विद्वानों को कठिनाई होती है। इसके पीछे का कारण यह है कि इस समय के कुछ ग्रंथ अप्राप्य हैं तो कुछ रचनाओं पर प्रामाणिकता-अप्रामाणिकता का सवाल लगा हुआ है, वहीं कुछ ग्रंथों में ऐतिहासिक सामंजस्य का अभाव है। साथ ही इस युग में धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक आदि सभी क्षेत्रों में परस्पर विरोधी तत्व दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में किसी एक विशेष तत्व को ध्यान में रखकर इसका नाम निर्धारित कर देना उचित नहीं।

ने भी इसी युग में भारत विजय करने के लिए बार-बार आक्रमण किया था। उस वक्त के राजा पृथ्वीराज और जयचंद की पारस्परिक कलह और इसका लाभ उठाते हुए मुइज़ुद्दीन मुहम्मद ग़ौरी का विजय प्राप्त करना तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति का भली प्रकार प्रतिनिधित्व करता है। इस समय के कुछ आक्रमणकारी केवल लूटमार के लिए आए तथा सम्पत्ति लूट कर चले गए और कुछ धर्म-प्रचार की इच्छा से आए जबकि कुछ भारत की सुख-समृद्धि तथा विपुल धन-धान्य से आकृष्ट होकर इस देश पर अधिकार जमाने की धुन में लग गए। तत्कालीन राजपूत राजा कुछ समय तक तो इनसे लड़ते रहें परन्तु संगठित ना होने के कारण और अंतर्कलह से क्षीण होने के कारण वे जल्द सत्ता खो बैठें।

सामाजिक परिस्थिति

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राजनीतिक एकता भंग हो जाने के कारण इस युग में गृह कलह बढ़ गये थें और स्वयंवरों में बल-प्रदर्शन करने तक ही तत्कालीन राजाओं की वीरता सीमित हो गई थी। इस समय के भारतीय शासक प्रायः विलासी हो गये थें। युद्ध का वातावरण होने के कारण युद्ध और युद्ध में वीरता के साथ वीरगति प्राप्त करना जन-जीवन का एक अंग बन गया था। माताएँ ऐसे पुत्र की कामना करती थीं जो जन्म लेने के साथ ही तलवार चलाना शुरू कर दें-

हूँ बलिहारी राणियाँ भ्रूण सिखावण भाउ।
नालौ बाडर री छुरी झपट्यौ जाण्यो साउ॥

इस युग के स्त्री समाज में सती और जौहर की प्रथा व्यापक रूप से व्याप्त थी। युद्ध में पराजय हो जाने पर पत्नियाँ पति के साथ सती हो जाती थीं अथवा सामूहिक रूप से जौहर कर लेती थीं। कई पत्नियाँ तो युद्ध में जाते समय झिझक एवं मोह दिखाने वाले पतियों के सम्मुख अपना सिर काटकर रख दिया करती थीं।

धार्मिक परिस्थिति

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आदिकाल का समय धार्मिक दृष्टिकोण से बहुत ही उथल-पुथल का समय था। बौद्ध और जैन धर्मों में आंतरिक मतभेद के कारण विविध शाखाएँ निकल गई थीं। जहाँ एक ओर सम्राट हर्षवर्धन के समय में ब्राह्मण और बौद्ध धर्मों का समान आदर था। हर धर्म के प्रति एक उदार और धार्मिक सहिष्णुता की भावना व्याप्त थी, आपसी मेल-जोल था। वहीं हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात केन्द्रीय सत्ता के अभाव में जब देश खंड राज्यों में विभक्त हो गया तो धीरे-धीरे धर्म के क्षेत्र में भी अराजकता फैल गयी। वेद-शास्त्रों के विधि-विधान और कर्म-काण्ड को लेकर चलने वाले ब्राह्मण धर्म तथा बौद्ध धर्म में भी संघर्ष होने लगे। विभिन्न धार्मिक संप्रदाय अपने पवित्र रूप को सुरक्षित न रख सके और आंतरिक विवाद के कारण विकृत होकर नये-नये रूपों में जनता के सामने आने लगें। हीनयानवज्रयानमंत्रयानसहजयान आदि की उत्पत्ति के पीछे का यही कारण है। परिणामतः आम आदमी धर्म के वास्तविक आदर्श को भूलकर जादू-टोना और तंत्र-मंत्र में विश्वास करने लगा। समाज में पंच मकार (मांस, मैथुन, मत्स्य, मद्य तथा मुद्रा) जैसी साधना का प्रचार होने लगा। अपने इस रूप में ये मत विकारों को प्रश्रय देने लगे तथा वाममार्गी हो गये। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना तथा भोग-विलास को लेकर चलने वाले ये वाममार्गी ही बौद्ध-सिद्ध कहलाए तथा दूसरी तरफ धर्म,नियम संयम और हठयोग के द्वारा साधना के कठिन मार्ग पर चलने वाले नाथ सिद्ध के रूप में जाने गए पर अपने मूल रूप में ये दोनों ही बौद्ध थें, जो धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के विकृत या परिवर्तित रूप में ढलते चले गये। इन तंत्र साधनाओं में स्त्री और शूद्र दोनों के लिए द्वार खुला था इसलिए जन सामान्य के बीच इसका प्रचार हुआ। फलस्वरूप जैनबौद्धशैव और वैष्णव सभी संप्रदायों में तंत्रवाद का प्रभाव बढ़ गया था।

इसी काल में भुवनेश्वरपुरीखजुराहोसोमनाथकाँचीतंजौर आदि स्थानों पर अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ था, ये मंदिर भारतीय संस्कृति के केंद्रबिंदु बने। अरब इतिहासकार अल-बेरुनी इन मंदिरों की भव्यता के विषय में लिखते हैं-

सांस्कृतिक परिस्थिति

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आदिकाल का आरंभ उस समय हुआ जब भारतीय संस्कृति अपने चरमोत्कर्ष पर थी। दूसरी तरफ़ यह युग हिंदू-मुस्लिम संस्कृति के परस्पर मिलन का युग भी था। अतः यह वह युग था जब दो भिन्न संस्कृतियाँ आपस में मिल रही थी। संगीतचित्रमूर्ति एवं भवन निर्माण इत्यादि कलाओं में लोग विशेष रुचि रखने लगे थें। हालांकि दूसरी तरफ़ इसी युग में महमूद गजनवी जैसे कई आक्रांता भारत आए, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को क़ाफी क्षतिग्रस्त किया।

साहित्यिक परिस्थिति

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गुप्त साम्राज्य के ध्वस्त होने के बाद और सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् भारत का पश्चिमी भाग ही भारतीय सभ्यता और बल-वैभव का केंद्र बन गया था। भारत के इसी क्षेत्र में कन्नौजदिल्लीअजमेरअंहलवाड़ा आदि बड़ी-बड़ी राजधानियाँ थीं। इस क्षेत्र की भाषा का प्रचलन भी बढ़ गया था। अतः यह स्वाभाविक था कि उसी भू-भाग की जनता की चित्तवृत्ति के अनुरूप तत्कालीन साहित्य का निर्माण हुआ। उस समय के प्रमुख साहित्यिक सर्जक जो चारण कहलाते थें, भारत के पश्चिम में ही निवास करते थें। इसके अतिरिक्त पारस्परिक युद्ध तथा विदेशियों के निरंतर आक्रमणों के फलस्वरूप तत्कालीन समाज में एक प्रकार की अराजकता एवं अशांति की भावना उत्पन्न हो गई थी। ऐसी स्थिति में कविता के लिए युद्ध ही एकमात्र विषय बन गया था।


इस युग के कवि राजाओं का आश्रय प्राप्त करने और धन की प्राप्ति के लिए अपने आश्रयदाताओं की भरपूर प्रशंसा किया करते थें। युद्ध का सजीव वर्णन करने के लिए ये कवि अपने आश्रयदाताओं के साथ युद्ध में भी जाते थें। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य के आदि युग में वीर रस की कविताएँ प्रचुर मात्रा में मिलती हैं।

पारस्परिक युद्ध का एक बहुत बड़ा कारण बलपूर्वक सुन्दर कन्याओं की प्राप्ति भी था। यह प्रवृत्ति आदिकाल में इतनी बलवती हो गई थी कि बिना रक्तपात के कोई स्वयंवर पूरा होता ही न था। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद का संघर्ष इस प्रवृत्ति का प्रतीक है।[5] इसी प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर बुन्देलखण्ड के तत्कालीन सेनापति आल्हा लिखते हैं-


"जिहि की बिटिया सुन्दर देखी।
तिहि पर जाइ धरे हथियार॥"[22]

इस प्रवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ कि कविगण आश्रयदाता के शौर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करने के साथ ही उन्हें सुन्दर कन्याओं के ऊपर आसक्त कराने के कर्त्तव्य का भी पालन किया करते थें। इसके लिए वे संबंधित सुंदरी के रूप का बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थें जिस कारण वीरता के साथ शृंगारिकता की प्रवृत्ति भी इस युग के काव्य में मिलती है।



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