सिद्ध साहित्य विशेषता एवं प्रमुख ग्रंथ

                   सिद्ध साहित्य

बौद्ध धर्म के वज्रयान शाखा के अनुयायी उस समय सिद्ध कहलाते थें। बौद्धमत को मानने वाले आरंभ में ईश्वर की भक्ति का विरोध करते थें, लेकिन धीरे-धीरे वे ही बुद्ध को भगवान के रूप में पूजने लगें और जब बौद्ध धर्म में तांत्रिक सिद्धों का प्रभाव बहुत बढ़ गया, तो यह धर्म अपने वास्तविक रूप और दिशा से एकदम अलग हो गया। आठवीं शताब्दी के आस-पास इन तांत्रिक सिद्धों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया था। इन्होंने बौद्ध धर्म के त्याग और संयम के स्थान पर भोग विलास को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया था। शराब पीना और निम्न वर्ग की स्त्रियों को योगिनी कहकर उनके साथ भोग विलास करना आवश्यक समझा जाने लगा था। मांसमत्स्यमदिरामैथुन और मुद्रा, इन पाँच मकारों का सेवन इनकी साधना का प्रमुख अंग बन गया था। सिद्धों के चमत्कारों का नारी-समाज पर इतना प्रभाव पड़ा कि स्त्रियाँ लोक-लाज, कुल मर्यादा को छोड़कर विपरीत दिशा में जाने लगी। धर्म के नाम पर समाज में वासना अबाध गति से फूट कर बाहर निकल पड़ी। इन क्रियाओं का प्रयोग ही निर्वाण प्राप्ति समझा जाने लगा। मन के निर्विकार और निश्चल स्थितियों के लिए महासुख और सहजयान को प्रधानता दी जाने लगी। इन्होंने निर्वाण साधना या महासुख का वर्णन बड़ी अश्लील वाणी में किया हैं। अपनी इस महासुख अवस्था को ये समरस अवस्था भी कहते थें और अपनी खुली भाषा में आध्यात्मिक पुट देकर उसकी व्याख्या करते थें। इन सहजयानी सिद्धों की संख्या 84 मानी गई है। इनमें कुछ संस्कृत के अच्छे विद्वान थें। साहित्यिक योगदान की दष्टि से सिद्धों का साहित्य दोहा या दूहा नामक मुक्तक रूप में मिलता है। सिद्धों की नीति, रीति, शृंगार एवं धर्म संबंधी मान्यताएँ हिंदी के आदिकाल को तो विशेष प्रभावित नहीं करती पर संत साहित्य को अवश्य ही प्रभावित करती है, जिसे सिद्धों का योगदान माना जा सकता है।[40] सिद्ध साहित्य उस समय लिखा गया जब हिंदी अपभ्रंश से आधुनिक हिंदी की ओर विकसित हो रही थी। सरहप्पा (सरोजपाद अथवा सरोजभद्र) प्रथम सिद्ध कवि माने गए हैं। इसके अतिरिक्त शबरपालुइपाडोम्भिपाकण्हपाकुक्कुरिपा आदि सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि हैं।[24][23][5][41][42][7]

सिद्ध साहित्य की विशेषता
  • सिद्ध साहित्य में तंत्र साधना पर अधिक बल दिया गया है।
  • सिद्ध साधना पद्धति में शिव-शक्ति के युगल रूप की उपासना की जाती थी।
  • सिद्ध साहित्य में जाति प्रथा एवं वर्णभेद व्यवस्था का विरोध किया गया है।
  • इस साहित्य में ब्राह्मण धर्म का खंडन किया गया है।
  • सिद्धों में पंच मकार (मांस, मछली, मदिरा, मुद्रा, मैथुन) की दुष्प्रवृति देखने को मिलती है। हालांकि तंत्रशास्त्र में इसका अर्थ भिन्न बताया गया है।
  • भाषा के विकास की दष्टि से सिद्धों द्वारा प्रस्तुत अपभ्रंश भाषा ने हिंदी में महत्त्वपूर्ण योगदान निभाया है। क्योंकि 'संध्याभाषा' की शब्दावली से बहुत से शब्द-रूप कबीर आदि संतों की बानियों में प्रयुक्त किए गये हैं।
  • शैली की दृष्टि से सिद्ध साहित्य के मुक्तक काव्य से दूहा या दोहा, पद, चर्चा गीत तथा रहस्यात्मक उक्तियों से हिंदी में दोहा पद तथा गीति काव्य रूपों का प्रयोग, विद्यापति तथा संत कवियों ने खूब किया है।
  • दार्शनिक अथवा रहस्यात्मक दष्टि से सिद्ध-साहित्य ने शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा बौद्ध धर्म के शून्यवाद को मिलाकर शरीर में ही सारी सिद्धियों का स्रोत बताया है और उसका उपभोग करने की सलाह दी है।
  • सिद्ध-साहित्य ने संत-साहित्य को विशेषतः कबीरदादू तथा रविदास आदि कवियों को रहस्यवाद के क्षेत्र में तथा उलट-बांसियों के क्षेत्र में बहुत प्रभावित किया है।

कुछ प्रमुख सिद्ध ग्रंथ
कविग्रंथकालवर्ण्य विषय
सरहपा/सरहपाद/सरोरुहपाद/सरोजवज्र/राहुलवज्रदोहा कोश, चर्यागीतों की रचना769 ई॰गुरु सेवा, पाखंड विरोध का वर्णन
शबरपाचर्यापद780 ई॰अप्राप्य
लुइपा/लुहिणअप्राप्य773 ई॰ (लगभग)अप्राप्य
डोम्मिपा/डोंभिपाडोम्बिगीतिका, योगचर्या, अक्षरद्धिकोपदेश840 ई॰अप्राप्य
कण्हपाडोमिनी-गीत820 ई॰अप्राप्य
कुक्कुरिपाअप्राप्य843 ई॰अप्राप्य
विरूपाअप्राप्य843 ई॰ (लगभग)अप्राप्य

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