हिंदी साहित्य के आदिकाल की प्रवृत्तियां
आदिकाल की साहित्यिक प्रवृत्तियाँ
आदिकाल में एक ओर जहाँ कवियों द्वारा अपने-अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा में वीर काव्य रचे जा रहे थें तो वहीं दूसरी ओर सिद्धों, नाथों और जैनों के द्वारा भक्तिपरक काव्य भी रचे जा रहे थें। अतः इस युग के साहित्य को मूल रूप से रासो साहित्य और धार्मिक साहित्य दो भागों में बाँट कर देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस युग में स्वच्छंद प्रवृत्ति से लौकिक साहित्य भी रचे गए। साथ ही गद्य साहित्य के भी कुछ आरम्भिक संकेत इस युग में मिलते हैं। हालांकि इस युग की प्रामाणिकता संदिग्ध है परंतु संदिग्ध होते हुए भी इसके महत्व को भुलाया नहीं जा सकता। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों भाषा में और गद्य-पद्य दोनों रूपों में रचना की प्रधानता इस युग में मिलती है।
इस युग की साहित्यिक प्रवृतियाँ इस प्रकार है-
*वीर रस की प्रधानता
रासो ग्रंथों में यद्यपि सभी रसों का समावेश हुआ है, तथापि वीर रस से युक्त रचनाएँ इस युग में सर्वाधिक लिखी गई है। यही कारण है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा। इस काल के लेखक राजाओं पर निर्भर थें इसलिए उन्हें कई बार ना चाहते हुए भी राजा की वीरता व महानता को बढ़ा-चढ़ा कर वर्णित करना पड़ता था। जिससे राजा प्रसन्न होकर उन्हें प्रोत्साहन राशि देते थें। इस युग में गहरवार, चौहान, चंदेल, परिहार, सोलंकी आदि राजा आपस में ही लड़ाई करते रहते थें। युद्ध करना ही एक मात्र धर्म बन गया था।[23][24] यही कारण है कि जगनिक लिखते हैं-
बारह बरिस लै कूकर जीऐं ,औ तेरह लौ जिऐं सियार,
बरिस अठारह छत्री जिऐं ,आगे जीवन को धिक्कार।
इस काल में विदेशी आक्रमण के कारण भी निरंतर युद्ध हुआ करते थें इसलिए भी इस काल में वीर रसात्मक ग्रंथों का आधिक्य है। इन वीर रसात्मक ग्रंथों के कुछ उदाहरण है- पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो, हम्मीर रासो, बीसलदेव रासो आदि।
*युद्ध-वर्णन में सजीवता
रासो ग्रंथों में किये गये युद्ध वर्णन अत्यंत सजीव प्रतीत होते हैं। इन काव्य ग्रंथों में जहाँ-जहाँ युद्धवर्णन के प्रसंग हैं, वहाँ-वहाँ ऐसा प्रतीत होता है जैसे कवि युद्ध का आँखों देखा हाल सुना रहा है। इस युग के चारण कवि कलम के ही नहीं तलवार के भी धनी थें, अतः अवसर पड़ने पर वे अपने-अपने आश्रयदाता के साथ रणक्षेत्र में जाकर युद्ध भी लड़ते थें। युद्ध के दृश्यों को उन्होंने अपनी आँखों से देखा था, अतः इन युद्धवर्णनों में जो कुछ भी कहा गया है, वह उनकी अपनी वास्तविक अनुभूति है। इन कवियों ने केवल सैन्य बल का ही नहीं अपितु योद्धाओं के उमंगों, मनोदशाओं एवं क्रियाकलापों का भी सुंदर वर्णन किया है। इन युद्ध-प्रसंगों में कवि की कल्पना का चमत्कार न होकर वीर हृदय के उच्छ्वासों का स्पंदन है। तत्कालीन परिस्थितियों के कारण युद्ध एक अनिवार्य आवश्यकता थी, अतः एक ऐसे वर्ग की अपेक्षा राजाओं को रहती थी जो वीरों को युद्ध के लिए प्रोत्साहित कर सके। चारण कवि इसी आवश्यकता की पूर्ति करते थें।
*प्रामाणिकता का अभाव
आदिकाल के अधिकांश रासो काव्यों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। पृथ्वीराज रासो जो इस काल की प्रमुख रचना बतायी गई है, वह भी अप्रामाणिक मानी गई है
ऐतिहासिकता का अभाव
इस युग के वीर रसात्मक ग्रंथों की प्रामाणिकता संदिग्ध हैं। रासो साहित्य के चरित्र नायक भले ही ऐतिहासिक व्यक्ति हैं किन्तु इन काव्य-ग्रंथों में ऐतिहासिकता का अभाव देखने को मिलता है। इन ग्रंथों में तथ्य कम और कल्पना अधिक है। परिणामतः इनके माध्यम से अनेक ऐतिहासिक भ्रांतिया उत्पन्न होती है। इन ग्रंथों के रचयिताओं ने जो वर्णन किये हैं, वे तत्कालीन इतिहास से मेल नहीं खाते। अपने आश्रयदाता की तुलना अद्भुत, अलौकिक शक्तियों के साथ करना इन कवियों की जरूरत थी। कल्पना के द्वारा इन कवियों ने प्रत्येक वस्तु को रंगीन और अद्भुत बनाने का प्रयास किया हैं। इस युग के काव्य में साधारण घटना भी चमत्कारपूर्ण बना दी जाती थी। घटनाओं, नामावली तिथियों का जो विवरण रासो काव्यों में उपलब्ध होता है, वह इतिहास सम्मत नहीं है। ऐतिहासिक चरित्र नायकों को लेकर लिखे गए काव्य ग्रंथों में जिस सावधानी की अपेक्षा की जाती है, उससे ये ग्रंथ मेल नहीं खाते। परिणामतः इन ग्रंथों से किसी ऐतिहासिक तथ्य एवं सत्य का उद्घाटन नहीं होता। इतिहास में अतिशयोक्ति से बचा जाता है, जबकि चारण कवियों ने अतिशयोक्ति को प्रमुखता देते हुए कई काल्पनिक वर्णन किये हैं, यही कारण है कि इन ग्रंथों में ऐतिहासिकता का अभाव पाया जाता है।
*शृंगार रस की प्रधानता
इस काल में वीर रस के साथ शृंगार रस का भी सुंदर प्रयोग हुआ है। इस युग में कई युद्ध सुंदर राजकुमारियों से विवाह करने के उद्देश्य से लड़े जाते थें, अतः शृंगार रस के भावपूर्ण वर्णनों का समावेश इन काव्य ग्रंथों में होना स्वाभाविक है। इस युग के कवियों ने राजकुमारियों के स्वप्निल सौंदर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन नख-शिख परिपाटी पर किया है। इन वर्णनों से प्रसन्न हो कर राजा अक्सर कवियों को पुरस्कृत किया करते थें। नायिका के रूप-सौंदर्य के साथ-साथ उनके वयः संधि का भी सुंदर वर्णन रासो ग्रंथों में किया गया है। बीसलदेव रासो में संयोग-वियोग दोनों शृंगार रूपों का सुंदर प्रयोग हुआ है।[23][24] पृथ्वीराज रासो के शृंगार रस से युक्त एक पंक्ति का उदाहरण इस प्रकार है-
मनहुँ कला ससभान कला सोलह सो बन्निय।
बाल वैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय॥
*आश्रयदाताओं की प्रशंसा
आदिकाल के अधिकांश कवि राजाओं व सामंतों के आश्रय में रहते थें। उनको आश्रय तभी प्राप्त होता था जब वे अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा करते थें। ये रचयिता चारण कहे जाते थें जो अपने आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा में काव्य रचना करना अपना परम कर्तव्य समझते थें। अपने आश्रयदाता की श्रेष्ठता एवं प्रतिपक्षी राजा की हीनता का वर्णन अतिशयोक्ति में करना इन चारण कवियों की प्रमुख विशेषता थी। इन कवियों का आमजन से कोई विशेष लगाव नहीं था। जनता से रचना का संबंध सिर्फ श्रोता का रह गया था। प्रत्येक रचना राजा को खुश करने के लिए की जाती थी। जनता के कष्टों से कवियों का कोई लेना देना नहीं था। दरबारी कवि होने के कारण इन कवियों ने आश्रयदाता के शौर्य, यश एवं वैभव का काल्पनिक एवं अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। पृथ्वीराज रासो एवं खुमान रासो इसी कोटि की प्रशंसापरक काव्य रचनाएँ हैं, जिनमें कवि ने अपने चरित नायक को राम, कृष्ण, युधिष्ठिर, अर्जुन और हरिश्चंद्र से भी श्रेष्ठ बताते हुए प्रत्येक दृष्टि से उनकी महत्ता प्रतिपादित की है
*राष्ट्रीय एकता का अभाव
आदिकाल में राष्ट्रीय एकता का अभाव था। यही कारण है कि इस काल में वीरता का वर्णन तो बार-बार हुआ है, परन्तु उस वर्णन में स्वदेश अभिमान एवं राष्ट्रीयता की भावना का अभाव है। उस समय देश खंड-खंड राज्यों में विभक्त था और इन छोटे-छोटे राज्यों के शासक परस्पर कलह और संषर्ध में रत रहते थें। ये राजा दस-बीस गाँवों के छोटे से राज्य को ही राष्ट्र समझते थें। चूँकि इस समय के कवि राजाश्रय में जीवन यापन करते थें इसलिए कवि भी अपने राजा के अलावा शेष राजाओं को नीचा दिखाने के लिए काव्य रचते थें और अपने राजा की झूठी सच्ची बातों को बढ़ा-चढ़ा कर उन्हें चक्रवर्ती सम्राट घोषित करने में कोई संकोच महसूस नहीं करते थें। कवि जनता से अलग रहने के कारण सामंती वैभव एवं ऐश्वर्य का वर्णन अधिक मात्रा में करते थें। अतः इस काल के कवि भी सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते थें। इस काल में प्रजा अपने राजा के अधिकार क्षेत्र को ही देश मानती थी और उसके प्रति अपनी पूरी आस्था और निष्ठा रखती थी, साथ ही पड़ोसी राज्य को वे शत्रु राष्ट्र समझते थें। अतः इस युग में सम्पूर्ण भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखने की भावना का अभाव था। परिणामतः विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संगठित होकर युद्ध करने में भी वे विफल हुए। पड़ोसी राज्य पर विदेशी आक्रमण होने पर ये रंचमात्र भी विचलित नहीं होते थें। इसी संकुचित राष्ट्रीयता के कारण धीरे-धीरे सभी देशी साम्राज्य विदेशी आक्रांताओं द्वारा पराजित हो गए।
*अतिशय कल्पना बोध
इस युग के चारण कवियों की रचनाएँ तथ्य परक न होकर कल्पना प्रधान होती थी। ऐतिहासिक पात्र तो इन रचनाओं में हैं पर इनमें इतिहास नाममात्र का ही है। इन कवियों ने कल्पना का सहारा लेते हुए घटनाओं, नामावलियों एवं तिथियों तक की कल्पना कर ली है। वस्तुतः इन रासो काव्यों में संभावना और कल्पना पर अधिक बल दिया गया है, तथ्यों पर कम। अपने आश्रयदाता की वीरता का काल्पनिक वर्णन करने में इन्होंने अतिशयोक्ति का सहारा लिया है और इसी क्रम में ऐतिहासिक सत्य की अवहेलना भी कर दी है। इन वीरगाथाओं को इसी कारण से काल्पनिक कथा युक्त रचनाएँ कहना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है
विविध छंदों एवं अलंकारों का प्रयोग
इस युग के ग्रंथों में छंदों की विविधता स्पष्ट परिलक्षित होती है। छंदों की यह विविधता हिंदी के न तो परवर्ती साहित्य में मिलती है न पूर्ववर्ती साहित्य में। दोहा, गाथा, पद्धरि, तोमर, तोटक, रोला, उल्लाला, साटक, कुंडलिया आदि इस युग के प्रचलित छंद हैं। इन छंदो का प्रयोग मात्र कलात्मकता या चमत्कार प्रदर्शन के लिए न होकर भाव-प्रकाशन के लिए भी किया जाता था। पृथ्वीराज रासो में तो 10,000 से अधिक छंद हैं।
इस युग की रचनाओं में अतिशयोक्ति अलंकार का बहुधा प्रयोग किया गया है। अनुप्रास अलंकार, यमक अलंकार, श्लेष अलंकार उपमा अलंकार, रूपक अलंकार और उत्प्रेक्षा अलंकार का चित्रण भी इन काव्य ग्रंथों में मिलता है। सौंदर्य चित्रण में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग बहुधा हुआ है।
*भाषा शैली
इस काल के साहित्य में हमें मूल रूप से अपभ्रंश, डिंगल-पिंगल, मैथिली और खड़ी बोली चार भाषाओं के प्रयोग दिखते हैं।
- *अपभ्रंश
यह भाषा योग मार्ग के बौद्धों की रचनाओं में, नाथपंथियों के प्रचार-ग्रंथों में, जो मूलतः राजपूताना तथा पंजाब की प्रचलित भाषा में लिखे गये हैं और जैन आचार्य मेरुतुंग, सोमप्रभु सूरि आदि के ग्रंथों में प्रयुक्त मिलती है। विद्यापति ने भी अपभ्रंश में छोटे-छोटे ग्रंथों की रचना की है। सिद्धों के द्वारा प्रयुक्त अपभ्रंश में पूर्वी प्रभाव तथा जैन साहित्य में नागर अपभ्रंश का विशेष प्रभाव दिखाई देता है। इन ग्रंथों में चरित्र, रासक, चतुष्पदी ढाल, दूहा आदि छंदो का प्रयोग हुआ है। विषय की दृष्टि से तांत्रिक साहित्य, वीरगाथा साहित्य, श्रृंगार काव्य तथा दर्शन साहित्य का आरंभिक रूप अपभ्रंश के ही अंतर्गत दिखाई देता है। वस्तु-स्थिति यह है कि उस समय के कवियों की बहुप्रचलित भाषा अपभ्रंश ही थी। सिद्धों और नाथों की कृतियों में देश-भाषा-मिश्रित अपभ्रंश का रूप प्राप्त होता है। इस भाषा को संध्या भाषा भी कहा जाता है क्योंकि यह भाषा अपभ्रंश के संध्या काल (अंतिम समय में) में प्रचलित थी। अपभ्रंश के इस संध्या भाषा रूप से ही पुरानी हिंदी जिसे ब्रज और खड़ी बोली जैसे काव्य-भाषा का ढाँचा कहा गया है, पनपी है। अपभ्रंश भाषा जैसे-जैसे देशभाषा की ओर बढ़ती गई, इसमें संस्कृत, तत्सम और तद्भव शब्दों के प्रयोगों को अधिकाधिक स्थान प्राप्त होता गया। अरबी-फारसी के शब्द भी प्रचलन में आने लगे।
- *डिंगल और पिंगल
प्रादेशिक बोलियों के साथ ब्रजभाषा तथा मध्य देश की भाषा के संयोग से जो भाषा बनी वह पिंगल कहलाई जबकि अपभ्रंश भाषा से युक्त बोलचाल की राजस्थानी के साहित्यिक रूप को डिंगल कहा गया। हिंदी साहित्य के इतिहास में इनका विशेष स्थान है। पिंगल भाषा में फारसी, अरबी, तुर्की के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। डिंगल और पिंगल का मिश्रित रूप वीरगाथाओं में दिखाई देता है। भाषा की दृष्टि से डिंगल साहित्य बहुत ही अव्यवस्थित है। विशेष रूप से परवर्ती परिवर्तनों के कारण इसके शुद्ध रूप का पता लगाना कठिन है। पिंगल के अतिरिक्त डिंगल में अपभ्रंश के प्रभाव के कारण संयुक्ताक्षरों और अनुस्वारों की अधिकता हो गई है। इस कारण से डिंगल भाषा कुछ-कुछ कृत्रिम लगती है। चारण कवियों ने डिंगल और पिंगल दोनों का साथ-साथ प्रयोग किया है। वस्तुतः डिंगल राजस्थानी की रचना शैली की भाषा है और पिंगल ब्रजभाषा की रचना शैली की भाषा।[34][35][36]
- *मैथिली भाषा
मैथिली बिहार में प्रयुक्त एक बोली है और यह हिंदी की एक विभाषा मानी जाती है। यही कारण है कि विद्यापति की पदावली को हिंदी का ग्रंथ माना जाता है। आदिकालीन ग्रंथों में विद्यापति की पदावली का विशेष स्थान है।[37][38]
- *खड़ी बोली
अमीर खुसरो के काव्य में जनता की उस बोली के दर्शन होते हैं जो कालांतर में विकसित होकर खड़ी बोली कहलाई। तत्कालीन जनभाषा के दर्शन खुसरो की पहेलियों और मुकरियों में मिलता है। यह दिल्ली और मेरठ की आस-पास की भाषा थी। इस भाषा की क्रियाएँ हिंदी की हैं, साथ ही इसमें अरबी-फारसी के भी काफी शब्द मिलते हैं।
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